सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आरोग को 90 दिन के अंदर देश में अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करने का आदेश दिया है। भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय ने जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च अदालत ने राज्य स्तर पर अल्पसंख्यकों की पहचान के दिशा-निर्देश तय करने का आदेश भी दिया है। प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले पर सुनवाई की।

याचिका में मांग की गई थी कि राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम की धारा 2(सी) को रद्द किया जाए, क्योंकि यह धारा मनमानी, अतार्किक और अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करती है। इस धारा में केंद्र सरकार को किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने के असीमित और मनमाने अधिकार दिए गए हैं।

इसके अलावा मांग की गई थी कि केंद्र सरकार की 23 अक्टूबर, 1993 की उस अधिसूचना को रद्द किया जाए, जिसमें पांच समुदायों- मुसलमान, ईसाई, बौद्ध, सिख और पारसी को अल्पसंख्यक घोषित किया गया है।

तीसरी मांग यह थी कि केंद्र सरकार को निर्देश दिया जाए कि वह अल्पसंख्यक की परिभाषा तय करे और अल्पसंख्यकों की पहचान के लिए दिशा-निर्देश बनाए। ताकि यह सुनिश्चित हो कि सिर्फ उन्हीं अल्पसंख्यकों को संविधान के अनुच्छेद 29-30 में अधिकार और संरक्षण मिले जो वास्तव में धार्मिक और भाषाई, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक रूप से प्रभावशाली न हों और जो संख्या में बहुत कम हों।

याचिकाकर्ता ने इस मांग के साथ वैकल्पिक मांग भी रखी थी, जिसमें कहा है कि या तो कोर्ट स्वयं ही आदेश दे कि संविधान के अनुच्छेद 29-30 के तहत सिर्फ उन्हीं वर्गों को संरक्षण और अधिकार मिलेगा जो धार्मिक और भाषाई, आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक रूप से प्रभावशाली नहीं हैं और जिनकी संख्या राज्य की कुल जनसंख्या की एक फीसदी से ज्यादा नहीं है।

याचिका में सुप्रीम कोर्ट के टीएमए पई मामले में दिए गए संविधान पीठ के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया था कि अल्पसंख्यक की पहचान राज्य स्तर पर की जाए न कि राष्ट्रीय स्तर पर। क्योंकि कई राज्यों में जो वर्ग बहुसंख्यक हैं, उन्हें अल्पसंख्यक का लाभ मिल रहा है।कहा गया कि सरकार तकनीकी शिक्षा में 20,000 रुपए छात्रवृत्ति देती है जम्मू-कश्मीर में मुसलमान 68.30 फीसदी हैं लेकिन सरकार ने वहां 753 में से 717 छात्रवृत्ति मुस्लिम छात्रों को आवंटित की हैं। एक भी हिंदू को छात्रवृत्ति नहीं दी गई है।

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