राजस्थान में कांग्रेस द्वारा अपनी नेता स्पर्धा चौधरी को छह वर्ष के लिए निष्कासित किए जाने की ख़बरों ने बीते दिनों जमकर सुर्ख़ियां बटोरी थीं. स्पर्धा फुलेरा विधानसभा क्षेत्र में कांग्रेस की टिकट की प्रमुख दावेदार मानी जा रही थीं. टिकट वितरण के दौरान प्रदेश कांग्रेस में जिन सीटों को लेकर गहमागहमी की ख़बरें आईं, उनमें फुलेरा प्रमुख थी. राजस्थान में नेता प्रतिपक्ष रामेश्वर डूडी स्पर्धा का समर्थन कर रहे थे जबकि कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष सचिन पायलट उनके पक्ष में नहीं थे. इस बात से नाराज़ स्पर्धा और उनके समर्थकों ने दिल्ली में सचिन पायलट की गाड़ी का घेराव कर जमकर नारेबाजी की. इस दौरान सचिन पायलट के राजस्थान से बाहर के होने के भी नारे लगे. स्पर्धा के इसी विरोध को अनुशासनहीनता क़रार देते हुए संगठन ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया.लेकिन यह पहली बार नहीं था जब सचिन पायलट को राजस्थान से बाहर का बताया गया. पिछले कुछ दिनों के दौरान सूबे के के राजनैतिक गलियारों में यह बात कई बार कही-सुनी गई है. दरअसल, इस बात के तार सचिन पायलट के पिता और कांग्रेस के कद्दावर नेता राजेश पायलट से जुड़ते हैं. बताया जाता है कि वे उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से ताल्लुक रखते थे. बात 1980 के लोकसभा चुनावों की है जब भारतीय वायुसेना में कार्यरत राजेश पायलट उर्फ़ राजेश्वर प्रसाद बिधूड़ी ने सक्रिय राजनीति में आने का फैसला लिया. हालांकि वायुसेना ने पहले उनका इस्तीफा का नामंजूर कर दिया था जिसे तत्कालीन राष्ट्रपति फ़ख़रूद्दीन अली अहमद के हस्तक्षेप के बाद ही स्वीकार किया गया. राजेश पायलट की पत्नी रमा पायलट एक साक्षात्कार में बताती हैं, ‘इस्तीफ़े के बाद राजेश ने इंदिरा गांधी के सामने जाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के ख़िलाफ़ बागपत से चुनाव लड़ने की इच्छा ज़ाहिर की. लेकिन श्रीमती गांधी ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी.’बताया जाता है कि इंदिरा गांधी की इस प्रतिक्रिया के बाद भी राजेश पायलट ने प्रयास करना नहीं छोड़ा. रमा पायलट बताती हैं, ‘एक दिन संजय गांधी की तरफ से उनके पति के लिए एक फोन कॉल आया. इसमें उनसे मिलने का फरमान था. मुलाकात में राजेश को बताया गया कि उन्हें भरतपुर से चुनाव लड़ना है. हम लोगों ने भरतपुर का नाम नहीं सुना था. लेकिन उनसे पूछने की हमारी हिम्मत भी नहीं पड़ी. ख़ैर, पता चला कि भरतपुर, राजस्थान में है.’

भरतपुर के एक वरिष्ठ राजनीतिकार की मानें तो जब राजेश्वर प्रसाद बिधूड़ी यहां ऐन मौके पर पर्चा भरने आए तो जिला कांग्रेस के लोगों ने उन्हें पहचनाने से इन्कार कर दिया. कार्यकर्ताओं का कहना था कि हाईकमान की तरफ से किसी पायलट के आने की बात कही गई थी, बिधूड़ी की नहीं. जिला कांग्रेस से जुड़े सूत्रों के मुताबिक कार्यकर्ताओं की इस प्रतिक्रिया के पीछे तत्कालीन कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष जगन्नाथ पहाड़िया का भी इशारा था ताकि इस आपाधापी में नामांकन का समय गुज़र जाए. दरअसल पहाड़िया की मंशा अपनी पत्नी को भरतपुर से चुनाव लड़वाने की थी.

रमा पायलट के शब्दों में ‘इन्होंने बहुत समझाने की कोशिश की कि वो ही पायलट हैं, लेकिन किसी ने उनकी बात नहीं सुनी. तभी संजय गांधी का इनके पास फ़ोन आया कि कचहरी जाकर तुरंत अपना नाम राजेश्वर प्रसाद से बदलवा कर राजेश पायलट करवाओ. तब उन्होंने कचहरी में हलफ़नामा दे कर अपना नाम बदलवाया. फिर संजय गांधी ने स्थानीय नेताओं से कहा कि ये जो शख़्स आपके यहां पर्चा दाख़िल करने आए हैं, यही राजेश पायलट हैं.’ ज़ाहिर तौर पर न सिर्फ भरतपुर बल्कि पूरे राजस्थान ने राजेश्वर प्रसाद को अपना लिया था. यही कारण था कि भरतपुर के बाद उन्होंने दौसा जिले को अपनी कर्मभूमि के तौर पर चुना तो सचिन पायलट अजमेर से जीतकर सबसे कम उम्र के सांसद बनने में सफल हुए. और, रमा पायलट मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को उन्हीं के गढ़ झालरापाटन में जाकर चुनौती देने की हिम्मत जुटा पाईं. लेकिन चार दशक बाद पायलट परिवार के राजस्थान का न होने का जिन्न एक बार फिर बाहर निकला है. देखने वाली बात होगी कि क्या मुख्यमंत्री बनने का ख़्वाब संजोये सचिन पायलट, अपनी पहचान से जुड़े इस सवाल से अपने पिता की ही तरह आसानी से निपट पाएंगे?यहां आपको यह जानना दिलचस्प लग सकता है कि बीते दिनों सचिन पायलट ने प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को बाहरी बताते हुए बड़ा हमला बोला था. दरअसल, राजे ग्वालियर के पूर्व राजघराने से ताल्लुक रखती हैं. वसुंधरा राजे की शादी 1972-73 में धौलपुर (राजस्थान) के पूर्व राजघराने के इकलौते वारिस हेमंत सिंह से हुई थी. लेकिन यह रिश्ता एक साल भी नहीं टिक पाया और दोनों के बीच तलाक़ हो गया. हालांकि 30 साल चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद 2007 में धौलपुर महल सहित हेमंत सिंह की जायदाद का बड़ा हिस्सा वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह के अधिकार में तो आ गया था. लेकिन हेमंत सिंह से रिश्ता ख़त्म होने के बाद शायद धौलपुर के लोग राजे को स्वीकार नहीं कर पाए. शायद यही कारण था कि 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में राजे को धौलपुर सीट पर बनवारी लाल शर्मा के हाथों शिकस्त का सामना करना पड़ा.विश्लेषकों की मानें तो यह ऐसा मोड़ था जब राजस्थान ने वसुंधरा राजे के लिए अपने दरवाज़े बंद कर लिए थे. लेकिन तब भाजपा के कद्दावर नेता भैरों सिंह शेखावत ने डावांडोल होते राजे के राजनैतिक कैरियर की डोर को थाम लिया और विधायक प्रेमसिंह सिंघवी जैसे करीबियों की मदद से राजे के पैर मध्यप्रदेश से सटे झालावाड़ में जमवाए. बाकी इतिहास है.

अपनी प्रतिक्रिया दें

महत्वपूर्ण सूचना

भारत सरकार की नई आईटी पॉलिसी के तहत किसी भी विषय/ व्यक्ति विशेष, समुदाय, धर्म तथा देश के विरुद्ध आपत्तिजनक टिप्पणी दंडनीय अपराध है। इस प्रकार की टिप्पणी पर कानूनी कार्रवाई (सजा या अर्थदंड अथवा दोनों) का प्रावधान है। अत: इस फोरम में भेजे गए किसी भी टिप्पणी की जिम्मेदारी पूर्णत: लेखक की होगी।

और भी पढ़ें..

विज्ञापन

फोटो-फीचर

हिंदी ई-न्यूज़ से जुड़े