यह भ्रम फैलाया जाता है कि सिविल सेवा परीक्षा की दृष्टि से एक-दो विषय ही स्कोरिंग हैं, इस लिए उन्हें ही चुनना चाहिए। लेकिन स्कोरिंग होने के नाम पर यदि कोई ऐसा विषय चुन लिया गया, जिसमें आपकी रुचि नहीं है तो फिर ऐसे में आप स्वयं सोच सकते हैं कि इस विषय में आप कैसा प्रदर्शन कर पायेंगे। बिना रुचि के किसी विषय की जबर्दस्ती तैयारी करने से आपका न तो उसमें मन लगेगा और न ही आप उसके प्रति सकारात्मक रवैया ही अपना सकेंगे। इसका परिणाम आप के खराब प्रदर्शन के रूप में सामने आयेगा और आप निराश व हताश होंगे। आयोग द्वारा इतने विषयों का विकल्प देने का उद्देश्य ही यही है कि कोई भी अभ्यर्थी अपनी इच्छा से अपनी रुचि का विषय ले और उसी में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करे।
सिविल सेवा परीक्षा में भाग लेने वाले अभ्यर्थियों के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या अनुकूल विषयों के चयन की होती है। सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी शुरू करने से पहले आप सावधानीपूर्वक अपने वैकल्पिक विषयों, प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा दोनों के लिए का चयन करें। विषयों का चयन करते समय आप कुछ कसौटियों का ध्यान रखें, जैसे-वह विषय आप ने स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ा है या नहीं, उस विषय में आपकी रुचि है या नहीं, वह विषय सिविल सेवा परीक्षा में स्कोरिंग है या नहीं और वह सामान्य अध्ययन प्रश्न-पत्र की तैयारी में कितना सहायक है। इसके साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि उस विषय की तैयारी के लिए स्तरीय और प्रामाणिक पुस्तकें तथा अन्य आवश्यक अध्ययन सामग्रियां सहजता से उपलब्ध हैं या नहीं।
प्राय: यह भ्रम फैलाया जाता है कि सिविल सेवा परीक्षा की दृष्टि से एक-दो विषय ही स्कोरिंग हैं, इस लिए उन्हें ही चुनना चाहिए। लेकिन स्कोरिंग होने के नाम पर यदि कोई ऐसा विषय चुन लिया गया, जिसमें आपकी रुचि नहीं है तो फिर ऐसे में आप स्वयं सोच सकते हैं कि इस विषय में आप कैसा प्रदर्शन कर पायेंगे। बिना रुचि के किसी विषय की जबर्दस्ती तैयारी करने से आपका न तो उसमें मन लगेगा और न ही आप उसके प्रति सकारात्मक रवैया ही अपना सकेंगे। इसका परिणाम आप के खराब प्रदर्शन के रूप में सामने आयेगा और आप निराश व हताश होंगे।
आयोग द्वारा इतने विषयों का विकल्प देने का उद्देश्य ही यही है कि कोई भी अभ्यर्थी अपनी इच्छा से अपनी रुचि का विषय ले और उसी में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करे। दरअसल आयोग द्वारा ली जाने वाली इस परीक्षा द्वारा उन प्रशासनिक अधिकारियों का चयन किया जाता है, जिनके सामने अपनी सेवा के दौरान अनगिनत चुनौतियां होती हैं। इन चुनौतियों का सामना करते हुए एक प्रशासक को प्राय: त्वरित और कारगर निर्णय लेने होते हैं और ऐसी चुनौती का सामना वही कर सकता है, जो कुशाग्र बुद्धि हो, जिसने अपनी बुद्धि को पर्याप्त रूप से मांजा हो व कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी अपना संयम न खोते हुए ठंडे दिमाग से काम ले।
यही कारण है कि सिविल सेवा प्रारंभिक तथा मुख्य परीक्षा में पूछे जाने वाले अधिकांश प्रश्न ऐसे होते हैं, जिनका उत्तर पहले से रट कर या किसी बने-बनाये ढर्रे पर नहीं दिया जा सकता।  अभ्यर्थी को इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि इसके लिए न तो कोई शार्टकट रास्ता है और न ही कोई जादू की छड़ी। इसके लिए सबसे जरूरी बात है, सही दिशा में लगातार कड़ी मेहनत।
जो एक बात और ध्यान रखने वाली है, वह यह है कि सिविल सेवा में शामिल होने की इच्छा संजोने वाले किसी भी अभ्यर्थी के लिए यह आवश्यक है कि वह सबसे पहले स्वयं अपना मूल्यांकन करे कि वह वास्तव में इस सेवा के लायक है भी या नहीं। कई बार ऐसा देखा गया है कि अधिकांश छात्रा दूसरों की देखा-देखी सीधे सिविल सेवा परीक्षा को अपना लक्ष्य बना लेते हैं-बिना किसी सुविचारित योजना के। ऐसे में होता यह है कि वे हर साल परीक्षा के लिए आवेदन तो करते हैं, लेकिन प्रारंभिक परीक्षा तक उत्तीर्ण नहीं कर पाते, एक समय ऐसा आता है, जब उनके सारे अवसर खत्म हो जाते हैं और वे जहां से चले थे, वहीं खड़े मिलते हैं- हताश और निराश। विडम्बना तो यह है कि सिविल सेवा परीक्षा देते समय हिन्दी भाषी क्षेत्रों के अधिकांश छात्रा किसी और परीक्षा की तैयारी के प्रति पूरी तरह से उदासीन रहते हैं। यदि वे सिविल सेवा परीक्षा के साथ-साथ अन्य प्रतियोगिता परीक्षाओं के प्रति थोड़ा-सा भी गंभीर होते तो यह कापफी हद तक संभव था कि उसमें उनका चयन हो जाता। 
संघ लोक सेवा आयोग द्वारा प्रस्तावित विषयों की सूची से अपना वैकल्पिक विषय चुनते समय कई बार अभ्यर्थी पेशोपेश में पड़ जाते हैं। दरअसल वे अपनी रुचि का जो विषय लेना चाहते हैं, उसे इच्छा रहते हुए भी नहीं ले पाते। ऐसा इसलिए होता है, क्यों कि प्राय: उस विषय में न तो प्रामाणिक पुस्तकें उपलब्ध होती हैं और न ही कोई सही मार्गदर्शन। यह समस्या खासकर हिन्दी माध्यम के  अभ्यर्थियों के समक्ष उत्पन्न होती है। प्राय: वे जो विषय लेना चाहते हैं-उनमें हिन्दी माध्यम में विश्वसनीय पुस्तकें या अध्ययन सामग्री उन्हें नहीं मिल पाती। यदि कुछ सामग्री उन्हें मिल भी जाती है, तो उनमें समय-समय पर होने वाले विकास की जानकारी उन्हें नहीं मिल पाती, ताकि वे अपनी तैयारी को 'अप टु डेटÓ रख सकें। इस कठिनाई से सबसे ज्यादा दुखी हिन्दी माध्यम में विज्ञान वर्ग से संबंधित विषय लेने वाले या फिर वाणिज्य या विधि विषय वाले अभ्यर्थी होते हैं। यह स्थिति दुखद जरूर है, पर इससे भी निपटा जा सकता है। उन्हें सबसे पहले तो इन विषयों पर उपलब्ध सामग्री को एकत्रित करना चाहिए। साथ ही, अंग्रेजी पुस्तकों या जर्नलों का सहारा लेकर नोट्स तैयार करने चाहिए। उन्हें परिश्रम करके ऐसा संक्षिप्त नोट्स तैयार करना चाहिए, जिससे कि वे किसी भी तरह का उत्तर दे सकें। 
इसके लिए उन्हें विषय पर अपना धारणात्मक ज्ञान भी विकसित करना चाहिए और अपने सहपाठियों, सीनियर्स या फिर अध्यापकों से इस पर विचार-विमर्श करके उनकी सलाह भी लेनी चाहिए। कला वर्ग के अभ्यर्थी भी प्राय: उधेड़बुन में रहते हैं कि वे कौन-सा विषय लेें और कौन-सा नहीं। कई बार यह भी देखने मेें आता है कि एक बार किसी विषय में खराब प्रदर्शन करने के बाद अभ्यार्थी अगली बार कोई दूसरा विषय ले लेते हैं और अगली बार भी जब वह उस विषय में अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते, तो फिर विषय परिवर्तित कर देते हैं। 
यह क्रम आगे भी चलता रहता है और अंतत: होता यह है कि किसी भी विषय पर उनकी पकड़ नहीं बन पाती। इन सभी परेशानियों से बचने के लिए सबसे सरल रास्ता यही है कि पहले ही आप अच्छी तरह से सोच-विचार कर अपने मनोनुकूल विषय का चयन करें, जिससे कि आप परीक्षा में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकें। अपनी रुचि वाले विषय का चयन करके आप पहले दौर में गहन अध्ययन करें। इसके बाद दूसरे दौर में उन चुने हुए क्षेत्रों का विशेष अध्ययन करें, जिनसे परीक्षा में प्राय: और अधिक प्रश्न पूछे जाते हैं। सम्यक रणनीति के साथ सही दिशा में उचित परिश्रम करें-आपको सफलता अवश्य मिलेगी।
सावधानी बरतें
किसी के दबाव या प्रभाव में कभी भी विषय का चयन न करें।
अपनी क्षमता को देखते हुए उस विषय का चयन करें, जिसमें आपका मन लग सके।
यदि आप उस विषय का चयन कर सकें, जिसे आपने स्नातक या स्नातकोत्तर स्तर पर पढ़ रखा और जिसमें आपकी रुचि भी है, तो यह स्थिति आपके लिए बेहतर होगी। इस बात का ध्यान रखें कि आपके द्वारा चयनित विषय पर पर्याप्त अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो।

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