ऑफिस में महज टाइम पर आने-जाने को ड्यूटी समझकर निभाते रहने की बजाय अगर आप आगे बढ़कर नये-नये आइडिया देंगे, बदलते वक्त के अनुसार सामने आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करते हुए उन्हें कामयाबी के साथ निभाएंगे, तो इससे निश्चित रूप से आपकी अलग पहचान बनेगी
बहुतेरे एम्प्लॉयी यह कहते हुए और दूसरों को सुनाते हुए मिल जाएंगे कि वे तो संस्थान के लिए काम करते हैं। यह एटीट्यूड अच्छा तो है, लेकिन इससे यह भी लगता है कि वे अपने बारे में शायद नहीं सोचते। अगर हर एम्प्लॉयी अपनी ग्रोथ और पहचान के बारे में सोचने लगे, तो इससे उनका तो भला होगा ही, संस्थान भी निश्चित रूप से आगे बढ़ता रहेगा। प्रीतीश चंद्रा एक बड़े संस्थान में काम करते हैं। उन्हें यहां पंद्रह साल हो गए, लेकिन इस अवधि में उन्हें सिर्फ एक प्रमोशन मिला है। सैलरी इंक्रीमेंट भी कुछ खास नहीं हुआ। इस पर वह हमेशा कुढ़ते रहते हैं और उनका लहजा भी हमेशा शिकायती भरा रहता है। हालांकि वह हमेशा टाइम पर ऑफिस आते और टाइम पूरा होने पर ही जाते हैं, लेकिन उन्होंने कभी इस बात पर गौर नहीं किया कि इतने सालों में उनके सामने तमाम लोगों को क्यों प्रमोशन और इंक्रीमेंट मिलता रहा? उनके साथ के कुछ लोग कैसे लगातार उन्नति करते हुए दूसरी यूनिट्स के हेड बन गए? दरअसल, इतने सालों में वह नौकरी को सिर्फ ड्यूटी मानकर निभाते रहे। न तो कभी आत्म-मूल्यांकन करने की कोशिश की और न ही खुद आगे बढ़कर किसी चुनौती को स्वीकार किया। प्लानिंग के लेवल पर भी उनका रुख ढीला-ढाला ही रहा। विभाग में कोई स्पेशल टास्क सामने आने पर अक्सर वह बॉस की नजरों से बचने की कोशिश भी करते रहे, ताकि कहीं उन्हें ही वह टास्क न दे दिया जाए। ऐसे में वह कभी भी बॉस की नजरों में अलग पहचान नहीं बना पाए। इसकी वजह से उन्हें औसत इंक्रीमेंट ही मिलता रहा, जबकि तरक्की औरों के खाते में जाती रही। अगर आप खुद को बेहतर साबित करना चाहते हैं तो इन बातों का ख्याल रखें....
अपनी जिम्मेदारी समझे, न जताएं एहसान :  अक्सर यह कहकर संस्थान पर एहसान जताने की कोशिश न करें कि आप ही हमेशा संस्थान के लिए सोचते और उसी के हित में करते हैं। हमेशा याद रखें कि संस्थान में काम करने वाला हर कर्मचारी वहीं के लिए काम करता है। जिसे जो काम सौंपा गया है, उसे अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उसे पूर्णता के साथ निभाना होता है। अपनी जिम्मेदारी या जवाबदेही से पीछे हटने वाले लोग ज्यादा समय तक वक्त नहीं काट सकते। कंपनी की नजर में हर एम्प्लॉयी एक समान होता है।
आत्ममुग्ध होने से बचें : यह सोच-सोचकर आत्ममुग्ध भी न होते रहें कि आप जिस भूमिका में हैं, वह संस्थान की नजर में काफी महत्वपूर्ण है। जरा सोचें संस्थान ने आपकी चलिटी और सक्षमता को देखते हुए ही आपको इस भूमिका के लिए चुना है, ऐसे में अपने इस रोल पर इतराना आगे चलकर खुद आपके लिए नकारात्मक भी हो सकता है। वर्तमान पावर और पद के साथ अगर आपका अहम भी बढ़ता गया और इस गुरूर में कहीं आप टॉप मैनेजमेंट की अवहेलना करने लगे, तो तय मानिए कि आपको ज्यादा वक्त तक शायद ही बर्दाश्त किया जाएगा। हो सकता है कि तात्कालिक जरूरतों को देखते हुए मैनेजमेंट आपको कुछ न कहे, लेकिन समय-समय पर मिलने वाले संकेतों को अगर आपने नहीं समझा और उसके मुताबिक खुद को बदला नहीं, तो समझ लें कि आपके लिए काउंटडाउन शुरू हो गया। मौका मिलते ही या तो आपको हाशिये पर कर दिया जाएगा या फिर बाहर। हो सकता है कि मैनेजमेंट द्वारा आपको भरोसे में लिए बगैर आपके बारे में कुछ कदम उठा लिए जाएं या फिर आपका स्थानांतरण कहीं दूर कर दिया जाए। इससे आप तिलमिला कर जल्दबाजी में कुछ ऐसे कदम भी उठा सकते हैं, जिससे मैनेजमेंट को और बहाना मिल जाए। इसलिए जब कभी ऐसी कोई स्थिति आए, तो अपने करीबी सूत्रों-संपर्को की सहायता से मैनेजमेंट को विश्वास में लेने का प्रयास करें। 
अपने लिए करें काम :  इस बात का ढिंढोरा पीटना छोड़ दें कि आप संस्थान के लिए बहुत मेहनत करते हैं, रात-दिन उसी के बारे में सोचते रहते हैं। इसकी बजाय आप खुद के लिए काम करें। इस बात पर कुछ लोग बिदक सकते हैं कि संस्थान की बजाय खुद के लिए काम करने वाला तो निरा स्वार्थी ही होगा, लेकिन इस बात पर गहराई से गौर करने की जरूरत है। अगर आप खुद के लिए काम करते हैं, तो आप अपने आपको आगे बढ़ाने के लिए भरपूर प्रयास करेंगे। ऑफिस में महज टाइम पर आने-जाने को ड्यूटी समझकर निभाते रहने की बजाय अगर आप आगे बढ़कर नये-नये आइडिया देंगे, बदलते वक्त के अनुसार सामने आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करते हुए उन्हें कामयाबी के साथ निभाएंगे, तो इससे निश्चित रूप से आपकी अलग पहचान बनेगी। नि:संदेह इससे आप तो आगे बढ़ेंगे ही, इसका फायदा संस्थान को भी मिलेगा। इसलिए एक बार कोई नौकरी मिल जाने के बाद रस्मी तौर पर उसे निभाने की बजाय उसे एक ऐसे अवसर के रूप में लें, जो आपको नई पहचान दिला सकता है। इसे आप कामयाबी की सीढ़ी बना सकते हैं।
समझें अपनी सीमा : कई बार कुछ एम्प्लॉयी यह समझ लेते हैं कि वे अपने संस्थान को जितना दे रहे हैं, उतना शायद ही कोई दे सकता है। एक वही हैं, जिनकी वजह से संस्थान इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है। उनके बिना कंपनी रसातल में चली जाएगी। जरा सोचें, अगर आप एक महासागर में कुछ बाल्टी पानी डालते हैं, तो इससे उस सागर का पानी कितना बढ़ जाएगा? इसी तरह अगर उस सागर से कुछ बाल्टी पानी निकाल लिया जाए, तो भी उस पर कितना फर्क पड़ेगा? एक बड़ी व्यवस्थित कंपनी या संस्थान को भी कुछ इसी तरह लिया जाना चाहिए। संस्थान के लिए बहुत बड़ी जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति को भी इसका ख्याल रखना चाहिए कि उसके होने या न होने से संस्थान का बहुत नफा या नुकसान नहीं होने वाला। बेहतर यही होगा कि जब तक, जहां रहें, विनम्रता और कुशलता के साथ अपना सर्वश्रेष्ठ देते रहें। 
>>  खुद की स्किल और खुद को आगे बढ़ाने के बारे में सोचें। आप अच्छा करेंगे, तो इसका लाभ आपके साथ-साथ संस्थान को भी मिलेगा। 
>>  नियमित जिम्मेदारियों के निर्वाह के साथ अलग पहचान के लिए कुछ अलग हटकर करें। पहल करते हुए चुनौतियां स्वीकार करें। 
>>  पद या पावर पर इतराने की बजाय अपने पैर हमेशा जमीन पर रखें, ताकि आगे कोई झटका न लगे।

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