- डाॅ. जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक, 

    सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

(1) उत्साह सबसे बड़ी शक्ति और निराशा सबसे बड़ी कमजोरी है:- 

आपाधापी के इस युग में जीवन की आशा कमजोर होती जा रही है। हर वर्ष आत्महत्या करने या खुद को हानि पहुंचाने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। चैकाने वाली बात यह है कि पहले जहाँ अवसाद के कारण ऐसा किया जा रहा था, वहीं अब छोटी-छोटी समस्याओं की कीमत पर जीवन को ताक पर रखा जा रहा है। निराशा के क्षणों से बाहर निकल कर खुद के अनमोल जीवन को महत्व देना चाहिए। जीवन का हर पल बहुत कीमती है, इसलिए पूरे उत्साह से उसे जीना चाहिए। उत्साह सबसे बड़ी शक्ति है और निराशा सबसे बड़ी कमजोरी है। आइये, उत्साह से भरे विचारों से निराशा से भरे विचारों को मात देने का हर पल प्रयास करें।

(2) जीवन का अनमोल उपहार एक बार ही मिलता है:- 

जरूरी है कि हम स्वयं में वास करने वाले परम पिता परमात्मा से प्रेम करें और सकारात्मक रहें। जितना ज्यादा हम अपने जीवन का सम्मान  करेंगे, जीवन में उत्सव मनाने के उतने ही मौके आएंगे। यह जीवन परम पिता परमात्मा का एक अनमोल उपहार है। यह उपहार आसानी से नहीं मिलता। ऐसे में कुछ कमियों के लिए रोकर इस जीवन रूपी अनमोल उपहार का अपमान क्यों किया जाए? मनुष्य का मस्तिष्क जो सोच सकता है और जिसमें विश्वास कर सकता है, उसे वह प्राप्त कर सकता है। प्रेरणा कभी भी तथा किसी भी वस्तुु से ली जा सकती है। हमारे चारों तरफ ऐसी अनगिनत चीजें हैं, जो हमारे लिए प्रेरणा स्त्रोत बन सकती हैं।

(3) पास रहता हूँ तेरे सदा में अरे, तू नहीं देख पाये तो मैं क्या करूँ:- 

जो व्यक्ति खुद में वास करने वाले परमात्मा को जान लेता है, उसके समक्ष दुनियाँ के तमाम रहस्यों से पर्दा उठ जाता है, लेकिन जो व्यक्ति खुद को नही खोज पाता, वह दुनियाँ के किसी भी रहस्य से पर्दा नहीं उठा सकता है। खुद को खोजने की कवायद असंभव को संभव बनाने जैसा कार्य है। दरअसल हम जन्म के बाद से ही बाहरी दुनियाँ के झमेलों में इतने अधिक फंस जाते हैं कि अंदर वास करने वाले परम पिता परमात्मा से वार्तालाप करने का समय ही नहीं मिलता। इस तरह से हम अपना अनमोल जीवन बाहर की दुनियाँ के साथ गुजार देते हैं। अंदर की दुनियाँ में सिर्फ हमारा परम पिता परमात्मा के वास करने की जगह है। परमात्मा को अपने अंदर खोजते वक्त और सारी खोजें खुद खत्म हो जाती हैं। फिर हम उस रास्ते के राहगीर बन जाते हैं, जिसके लिए यह जिंदगी मिली है।

(4) एकान्त प्रतिभा की पाठशाला है:- 

अक्सर लोग दुखों व समस्याओं में अपने को अकेला महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि सभी ने उनका साथ छोड़ दिया है और वह दुनिया में सिसकने, तड़पने व दुख भोगने के लिए अकेले रह गए हैं। जिन व्यक्तियों की इच्छाशक्ति असीम होती है, वे दुख व पीड़ा का सामना कर विजयी होकर निकलते हैं। जीवन में व्यक्ति अकेलेपन को हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण से ही क्यों देखता है? वास्तव में व्यक्ति का कनेक्शन जब परमात्मा से कट जाता है तब वह अपने को जीवन में अकेला पाता है। किसी महापुरूष ने कहा है कि एकांत प्रतिभा की पाठशाला है। एकान्त में बेहतर अवसर हम तलाश सकते हैं। एकान्त में मस्तिष्क सुलझा रहता है और परेशानियों व तनावों से लड़ने के लिए सद्विचार उत्पन्न होते हैं।

(5) तुम समय की रेत पर छोड़ते चलो निशां, देखती यह जमीं देखता है आसमान:- 

नए विचारों के प्रति हमारा आंतरिक प्रतिरोध और जीवन की अनजान डगर पर चलने में भय सफल जीवन की प्राप्ति में बड़ी बाधाएँ हैं। प्रायः हम अपनी संपूर्ण क्षमताओं और संभावनाओं की अपेक्षा पर खरे नहीं उतरते। हम नए विचारों और नए मार्गों पर उत्साहपूर्वक चलने से डरते हैं। हम केवल उन्हीं रास्तों पर चलने में सुविधा का अनुभव करते हैं, जिन पर पहले ही से लाखों लोग गुजरते रहे हों। यह जरूरी है कि हम अपना समय और अपनी शक्ति केवल किसी तरह जीवन व्यतीत करने में ही न लगाएँ, बल्कि हमें अपने जीवन को उत्साहपूर्ण, परोपकारी उद्देश्यपूर्ण एवं आनंदमय बनाने के लिए सतत प्रयास भी करते रहना चाहिए।

(6) एक ही दिन जी मगर इंसान बनकर जी, एक ही दिन जी मगर सफल अभियान बनकर जी:- 

एक आंकड़े के अनुसार औसतन प्रतिदिन लगभग 60 हजार विचार हमारे मन-मस्तिष्क में आते हैं। इनमें से अधिकांश पुनरावृत्ति मात्र होते हैं। ये वो विचार होते हैं जो गुजरे कल में भी हमारे मन में आए थे और संभवतः आगामी कल भी हमारे ध्यान और मन को व्यस्त रखेंगे। इसका परिणाम एक बहुत ही एकरस एवं सपाट सी जिंदगी होती है जो आनंद एवं प्रसन्नता की कौन कहे, सहज उत्साह तक से हमें वंचित रखती है। नए विचारों के प्रति ग्रहणशीलता तथा उत्साह सार्थक जीवन की कुंजी है। वक्त से लड़ कर जो अपना नसीब बदल दे, इन्सान वही जो अपनी तकदीर बदल दे, कल क्या होगा कभी न सोचो, क्या पता कल वक्त खुद अपनी तस्वीर बदल ले। ईष्र्या या घृणा के विचार मन में प्रवेश होते ही खुशी गायब हो जाती है। मैत्रीपूर्ण, उत्साहपूर्ण व शुभ भावनायुक्त विचारों से उदासी दूर हो जाती है। जीत ही सब कुछ नही है, बेहतर है कि हम किसी आदर्श के लिए प्रयासरत हों, आदर्श को सामने रखे बिना हम जीतेंगे क्या?

(7) जिन्दगी ऐसे जियो कि मिसाल बन जाये:- 

अधिकतर लोग समझते हैं कि सफल होने की एक उम्र होती है। यह ठीक है कि उम्र व्यक्ति की शारीरिक क्षमता कम कर सकती है, लेकिन उसके अनुभव, जुझारूपन और उत्साह को नहीं। उद्देश्य, लक्ष्य और उत्साह ही किसी को चैंपियन बनाते हैं। अपने उद्देश्य को प्राप्त करने, प्रयास करने और अपने लक्ष्य को पाने की कोई उम्र नहीं होती। व्यक्ति किसी भी उम्र में यह सब प्राप्त कर सकता है। हां, इसके लिए उसके संकल्प, उद्देश्य, ह्नदय में उत्साह, प्रसन्नता व काम करने की ललक होनी चाहिए। जरूरत है, अपनी आंतरिक सुप्त शक्तियों को जागृत करने की और अपने काम को लगन व जोश से अंजाम देने की। जीवन का समय बीतकर वापस नहीं लौटता। इसीलिए हमें हर पल एकाग्रता तथा मनोयोग से अपने निश्चित कर्म कर सफलता के नए मापदंड स्थापित करने का प्रयास करना चाहिए। एक कर दें हृदय अपने सेवकों के हे प्रभु, कर निज महान उद्देश्य उन पर कर प्रगट मेरे विभु। हमारे प्रत्येक कार्य-व्यवसाय रोजाना परमात्मा की सुन्दर प्रार्थना बने।

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