- - डा0 जगदीश गांधी, शिक्षाविद् एवं संस्थापक-प्रबन्धक,

सिटी मोन्टेसरी स्कूल, लखनऊ

(1) संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा नफरत से उपजी प्रलय का शिकार व्यक्तियों की स्मृति में अन्तर्राष्ट्रीय दिवस :-

                24 जनवरी 2005 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने नाजी यातना शिविरों की मुक्ति की 60वीं वर्षगांठ मनाई। इस सत्र के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में एक प्रस्ताव प्रलय के पीड़ितों की स्मृति में अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में 27 जनवरी को नामित करने के लिए तैयार किया गया था। 1 नवंबर 2005 में जनरल एसेम्बली ने इस संकल्प को अपनाया। यह पहली बार 27 जनवरी 2006 को मनाया गया। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान मुख्य रूप से यहूदी मूल के कई लोगों पर हुए अत्याचार की स्मृति में यह अन्तर्राष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। इस अत्याचार से पीड़ितों में रोमन, रोमा, रूसी नागरिक व सैनिक तथा युद्ध के कैदी भी शामिल हैं।

(2) किसी पागल तानाशाही द्वारा ऐसी दिल दहला देने वाली घटना दुबारा न हो :-

                यह दिन इसलिए मनाया जाता है कि सभी लोग मिलकर विश्व शान्ति तथा विश्व एकता की आवाज उठाये ताकि विश्व में ऐसी प्रलय भरी घटनायें दुबारा न हो। इस प्रलय से बचे हुए लोगों तथा मृतकों के परिवारजनों को इस अपार दुःख को सहन करने की शक्ति प्रदान करने की परमपिता परमात्मा से प्रार्थनायें की जाती हैं। इस दिवस पर प्रार्थनायें, शांति के लिए संगीत प्रोग्राम, शैक्षिक वर्कशाप, फिल्म शो आदि विशेष रूप से आयोजित होते हैं। इजराइल, उत्तरी अमेरिका तथा यूरोप के विभिन्न देशों में यह दिवस विशेष महत्व रखता है। यह दिवस नफरत से उपजे प्रलय, हिंसा, आतंकवाद तथा युद्धों के खिलाफ अपनी तरह का एक विश्वव्यापी अहिंसक आन्दोलन की तरह है। द्वितीय विश्व युद्ध में जर्मनी और यूरोप में जर्मन कब्जे वाले क्षेत्रों के दौरान लाखों लोगों की जानबूझकर हत्या और अपवित्र शब्द का इस्तेमाल किया गया। कई लोगों का नाजी कब्जे वाले यूरोप भर में फैले मौत शिविरों में निधन हो गया। सबसे कुख्यात शिविरों में से एक पोलैंड के पास था। सोवियत सैनिकों को 27 जनवरी 1945 को इसे मुक्त करने से पहले एक लाख से अधिक लोगों को निधन हो गया।

(3) जब तानाशाही हिटलर की नफरत से भरे नरसंहार से मानवता कांप उठी :-

                अडोल्फ हिटलर (२० अप्रैल, १८८९ - ३० अप्रैल, १९४५) एक जर्मन राजनेता एवं तानाशाह थे। वे राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन कामगार पार्टी के नेता थे। इस पार्टी को प्रायः नाजी पार्टी के नाम से जाना जाता है। सन् १९३३ से सन् १९४५ तक वह जर्मनी का शासक रहा। हिटलर को द्वितीय विश्वयुद्ध के लिये सर्वाधिक जिम्मेदार माना जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध तब हुआ जब उनके आदेश पर नात्सी सेना ने पोलैंड पर आक्रमण किया। फ्रांस और ब्रिटेन ने पोलैंड को सुरक्षा देने का वादा किया था और वादे के अनुसार उन दोनों ने नात्सी जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी। हिटलर साम्यवादियों और यहूदियों से बेहद नफरत तथा घृणा करता था। प्रथम विश्वयुद्ध के प्रारंभ होने के बाद हिटलर जर्मन सेना में भर्ती हो गया और फ्रांस में कई लड़ाइयों में उसने भाग लिया। 1918 ई. में युद्ध में घायल होने के कारण वह अस्पताल में रहा। जर्मनी की पराजय का उसको बहुत दुःख हुआ।

(4) संकुचित राष्ट्रीयता ने 20वीं सदी को खूनी सदी बना दिया :-

                हिटलर ने 1918 ई. में नाजी दल की स्थापना की। इसका उद्देश्य साम्यवादियों और यहूदियों से सब अधिकार छीनना था। इसके सदस्यों में देशप्रेम कूट-कूटकर भरा था। इस दल ने यहूदियों को प्रथम विश्वयुद्ध की हार के लिए दोषी ठहराया। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण जब नाजी दल के नेता हिटलर ने अपने ओजस्वी भाषणों में उसे ठीक करने का आश्वासन दिया तो अनेक जर्मन इस दल के सदस्य हो गए। उसने ‘‘मेरा संघर्ष’’ नाम से प्रकाशित पुस्तक में अपनी आत्मकथा लिखी। इसमें नाजी दल के सिद्धांतों का विवेचन किया। उसने इस पुस्तक में लिखा कि आर्य जाति सभी जातियों से श्रेष्ठ है और जर्मन आर्य हैं। उन्हें विश्व का नेतृत्व करना चाहिए। यहूदी सदा से संस्कृति में रोड़ा अटकाते आए हैं। जर्मन लोगों को साम्राज्य विस्तार का पूर्ण

अधिकार है। फ्रांस और रूस से लड़कर उन्हें जीवित रहने के लिए भूमि प्राप्त करनी चाहिए।

(5) अन्यायपूर्ण शासन का दुष्परिणाम मानव जाति को झेलना पड़ता है :-

                हिटलर ने नाजी दल के विरोधी व्यक्तियों को जेलखानों में डाल दिया। कार्यकारिणी और कानून बनाने की सारी शक्तियाँ हिटलर ने अपने हाथों में ले ली। 1934 में उन्होंने अपने को सर्वोच्च न्यायाधीश घोषित कर दिया। उसी वर्ष हिंडनबर्ग की मृत्यु के पश्चात् वे राष्ट्रपति भी बन बैठे। नाजी दल का आतंक जनजीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छा गया। 1933 से 1938 तक लाखों यहूदियों की हत्या कर दी गई। नवयुवकों में राष्ट्रपति के आदेशों का पूर्ण रूप से पालन करने की भावना भर दी गई और जर्मन जाति का भाग्य सुधारने के लिए सारी शक्ति हिटलर ने अपने हाथ में ले ली।

(6) द्वितीय विश्व युद्ध एक व्यक्ति हिटलर के नफरत व घृणा से भरे मस्तिष्क की उपज है :-

                हिटलर की महत्वाकांक्षा के परिणामस्वरूप द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ। जब अमरीका द्वितीय विश्व युद्ध में सम्मिलित हो गया तो हिटलर की सामरिक स्थिति बिगड़ने लगी। हिटलर के सैनिक अधिकारी उसके विरुद्ध षड्यंत्र रचने लगे। जब रूसियों ने बर्लिन पर आक्रमण किया तो हिटलर ने 30 अप्रैल, 1945, को आत्महत्या कर ली। यूरोप की धरती पर कत्लेआम मचा कर हिटलर को सबसे ज्यादा क्रूर आदमी के रूप में जाना गया। हिटलर नाम दुष्टता का पर्याय बन गया। प्रथम विश्वयुद्ध में ब्रिटिश सैनिकों ने एक घायल जर्मन सैनिक की जान बख्श दी थी। वह खुशनसीब सैनिक एडोल्फ हिटलर ही था, जिसने चुन-चुन के यहूदियों को कत्लेआम किया। वहीं, सिर्फ चार साल की उम्र में एक पादरी ने हिटलर को डूबने से बचाया था। द्वितीय विश्व युद्ध के यातना गृह के बारे में सभी जानते हैं। यहां यहूदी लोगों को इकट्ठा कर गैस चैम्बरों में ठूस दिया जाता था। यह आश्चर्य की बात है कि हिटलर ने इन यातनागृहों का कभी भी दौरा नहीं किया। हिटलर ने द्वितीय विश्व युद्ध में यूरोप की धरती को यहूदियों के खून से लाल कर दिया।

(7) हिटलर के यातना शिविर से जान बचाकर लौटे एक प्रिन्सिपल का अपने शिक्षकों के नाम पत्र :-

                प्रिन्सिपल ने पत्र में लिखा ‘‘प्यारे शिक्षकों, मैं एक नाजी यातना शिविर से जैसे-तैसे जीवित बचकर आने वाला व्यक्ति हूँ। वहाँ मैंने जो कुछ देखा, वह किसी को नहीं देखना चाहिए। वहाँ के गैस चैंबर्स विद्वान इंजीनियरों ने बनाए थे। बच्चों को जहर देने वाले लोग सुशिक्षित चिकित्सक थे। महिलाओं और बच्चों को गोलियों से भूनने वाले कॉलेज में उच्च शिक्षा प्राप्त स्नातक थे। इसलिए, मैं शिक्षा को संदेह की नजरों से देखने लगा हूँ। आपसे मेरी प्रार्थना है कि आप अपने छात्रों को ‘मनुष्य’ बनाने में सहायक बनें। आपके प्रयास ऐसे हो कि कोई भी विद्यार्थी दानव नहीं बनें। पढ़ना-लिखना और गिनना तभी तक सार्थक है, जब तक वे हमारे बच्चों को ‘अच्छा मनुष्य’ बनाने में सहायता करते हैं।ं’’

(8) उच्च मानवीय सद्गुणों से ओतप्रोत डॉक्टर यानुश कोर्चाक का बच्चों के प्रति अगाढ़ प्रेम :-

                इसी नाजी यातना शिविर में अनाथ बच्चों को पढ़ाने वाले एक उच्च मानवीय सद्गुणों से ओतप्रोत डॉक्टर यानुश कोर्चाक भी थे। यानुश कोर्चाक पोलैण्ड की वर्तमान राजधानी वारसा की यहूदी बस्ती के अनाथालय में बच्चों का पालन और शिक्षण करते थे। हिटलर के दरिन्दों ने इन अभागे बच्चों को त्रैब्लीन्का मृत्यु शिविर की भट्टियों में झोकने का फैसला कर लिया था। जब यानुश कोर्चाक से यह पूछा गया कि वे क्या चुनेंगे, ‘बच्चों के बिना जिंदगी या बच्चों के साथ मौत?’ तो कोर्चाक ने बिना हिचक और दुविधा के तुरंत कहा कि वे ‘बच्चों के साथ मौत को ही चुनेंगे।’’ गेस्टापो के एक अफसर ने उनसे कहा कि ‘हम जानते हैं कि आप अच्छे डॉक्टर हैं, आपके लिए त्रैब्लीन्का जाना जरूरी नहीं है।’ तब डा. यानुश कोर्चाक का जवाब था ‘‘मैं अपने ईमान का सौदा नहीं करता।’’

(9) जीवन के अंतिम क्षण तक सच्चे शिक्षक की भूमिका निभाई कोर्चाक ने :-

                नैतिक सौंदर्य के धनी यानुश कोर्चाक ने वीरोचित भाव से मौत का आलिंगन इसलिए किया था कि वे जीवन के अंतिम क्षण तक सच्चे शिक्षक की तरह बच्चों के साथ रहकर उन्हें धीरज बँधाते रहें। कहीं बच्चे घबरा न जाएँ और उनके नन्हें एवं कोमल हृदयों में मौत के इंतजार का काला डर समा न जाए। यानुश कार्चाक का नैतिक बल और अंतःकरण की अनन्य निर्मलता आज के शिक्षक के लिए प्रेरणा ही नहीं, एक बेजोड़ मिसाल है।

(10) एक बालक का जीवन बदलने से सारे विश्व में परिवर्तन आ सकता है :-

                ‘युद्ध के विचार सबसे पहले मनुष्य के मस्तिष्क में पैदा होते हैं अतः दुनियाँ से युद्धों को समाप्त करने के लिये मनुष्य के मस्तिष्क में ही शान्ति के विचार उत्पन्न करने होंगे।’ शान्ति के ऐसे विचार देने के लिए मनुष्य की सबसे श्रेष्ठ अवस्था बचपन ही है। एक छत के नीचे सब धर्मों की प्रार्थना होनी चाहिए तभी भारत की वसुधैब कुटुम्बकम् की अवधारण सरकार होगी। ईश्वर एक है और सभी धर्मों की किताबे उसी ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बताती हैं। थ्री क्लास रूम माडल-बच्चे की पहली कक्षा घर है, दूसरी कक्षा स्कूल है व तीसरी कक्षा समाज है। इन तीनों का बच्चे के मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है इसलिए हमें तीनों जगह ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि समाज को जोड़ने वाली विश्व एकता की शिक्षा मिल सके। विश्व एकता, विश्व शान्ति एवं वसुधैव कुटुम्बकम् के विचारों को बचपन से ही प्रत्येक बालक-बालिका को ग्रहण कराने की आवश्यकता है ताकि आज के ये बच्चे कल बड़े होकर सभी की खुशहाली एवं उन्नति के लिए संलग्न रहते हुए ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ अर्थात ‘सारी वसुधा एक कुटुम्ब के समान है’ के स्वप्न को साकार कर सके। एक बालक का जीवन बदलने से सारे विश्व में परिवर्तन आ सकते हैं।

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