अंक कैसे सहायता करते हैं? हम इनका कैसे उपयोग कर सकते हैं? यही मूल आधार है न्यूमरोलॉजी का।

 

तो अंक हमें सहायता करते हैं प्राकृतिक फ्रीक्वेंसी सेट करने के लिए! रेडियो के ऊपर अलग-अलग स्टेशन, अलग-अलग फ्रीक्वेंसी पर होते हैं। जब सही ट्यूनिंग नहीं होती तो शोर होता है। जब हम इसको सही फ्रीक्वेंसी से मैच करवा देते हैं तो क्या होता है? स्पष्ट संगीत या आवाज। कोई शोर नहीं। ठीक ऐसे ही जीवन में काम करती है न्यूमरोलॉजी।

 

प्रश्न है- मेरी फ्रीक्वेंसी क्या हैं? मेरी नेचुरल स्टेट क्या है, मेरे नेचुरल नंबर क्या हैं, मैं किससे पहचाना जाता हूं? हिन्दू भाषा में जो अक्षरों को नम्बर दिए हुए हैं उनका प्रयोग करते हुए अपने नाम को सशक्त किया जा सकता है। अंकों और अक्षरों का संतुलन बैठा तो नाम सशक्त हो जाता है।

एक सेब है उसमें दाग लगा हुआ है तो क्या उसकी कीमत पूरी मिलेगी? उसको दाग कहने की बजाय असंतुलित कहेंगे। तो सेब की कीमत कब मिलती है? जब वह बिल्कुल सही है खराब नहीं हुआ है। दुनिया में कुछ भी जब खराब हो जाता है तो उसकी कीमत गिर जाती है। उदाहरण सेब पूछ रहा है मेरे पूरे पैसे क्यों नहीं मिल रहे। व्यक्ति क्या कहता है ? जब मैं मेहनत कर रहा हूं तो मुझे पूरे पैसे क्यों नहीं मिल रहे।

 

न्यूमरोलॉजी में पूछेंगे क्या यह प्राकृतिक फ्रीक्वेंसी से परे हटा हुआ है, शायद इसलिए उसको पूरा लाभ नहीं मिल रहा है। तो क्या यहां न्यूमरोलॉजी मदद कर सकती है ? अब आपको न्यूमरोलॉजी का तर्क पकड़ में आ गया होगा! प्राकृतिक अवस्था क्या है ? उसको कैसे जानें ? फिर नाम में उसको कैसे फिट करें ? एक और पहलू है आपकी पहचान का- आपका हस्ताक्षर (सिग्नेचर)।

 

आपकी पहचान और कहां-कहां से होती है ? आप जो भी करते हैं वह कर्म आपकी पहचान हो सकता है। चेहरा आपकी पहचान है, अंगूठे की छाप पहचान है और आज के युग में मोबाइल नंबर भी आपकी पहचान है। ईमेल आईडी भी आपकी पहचान है। लोग सिर्फ आपके मोबाइल नंबर से आपको पहचनते हैं। लोग बिना आपकी शक्ल देखे आपसे व्यापार कर रहे हैं।

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